Showing posts with label घड़िया । Hindi Poems. Show all posts
Showing posts with label घड़िया । Hindi Poems. Show all posts

उलझन hindi Kavita


-: उलझन:-

कुछ समझ में नहीं आता
क्या करूं, क्या नहीं
राह पकडु, कौन सी
कुछ समझ में नहीं आता

मन करता है, यह करु
परिस्थिति कहती है, वह कर
पापा कहते हैं, यह सही
भैया कहते, वह सही

अपने आप को संभाला था
किसी तरह
वक्त के तेज थपेड़ों से
लेकिन आज उन्होंने
दिखाई एक अलग ही राह
मन तो करता है
इस पर चलने का
उड़ने का
पर ना जाने
कौन आवाज देता है
पीछे से
क्या करूं,क्या नहीं
नहीं आता कुछ समझ में

Pollution प्रदूषण


प्रदूषण, मानव, दानव, बेटा, विज्ञान, माँ, अग्रज


मेरे अनुसार मानव तथा साइंस पति-पत्नी है।  जिनके दो बेटे हैं, आविष्कार और प्रदूषण। यहां आविष्कार का मतलब उन सभी वस्तुओं से हैं, जिनका हम भोग करते हैं। उसके पीछे होने वाले एक्शन का रिएक्शन।  जिसे हम कभी-कभी प्रदूषण के नाम से भी जानते हैं। 

Pollution प्रदूषण 

दूर क्षैतीज पर
देख कुछ हलचल सी
मानव ललाट पर
उभर आई
गहन चिंता की रेखा

मानव
होश ही खो बैठा
जब सामने
विकराल रूप
दानव का देखा

मानव डर तो गया
पर पूछ लिया
कौन हो तुम ?
और काम क्या है यहां पर ?

हा ! हा ! हा !
क्या कहा?
तुम मुझे नहीं जानते
संपूर्ण धरती पर
साम्राज्य मेरा
फिर भी नहीं पहचानते

दूसरा बेटा हूं मैं
अपनी मां विज्ञान का
है, अग्रज सुख मेरा
पर बेटा विज्ञान का
मैं
एक्शन का रिएक्शन हूँ
प्रदुषण मेरा नाम है।
और दुःखी करना
मेरा काम है।

बाप देखे हैं, बहुत से
पर तुमसा देखा कहां !
क्रोध आता है, तुम पर
बेटो में भेदभाव देख यहाँ

तुम तो सदा ही
सुख को चाहते हो
पर अनदेखे के रूप में
मुझे भी पाते हो

मां ! अपने बच्चों में
अंतर कब आती है ?
अपने बच्चों को
सदा बराबर देना चाहती है

समय है
अभी भी संभल पाने का
अगर सुख की लालसा में
मुझे बढ़ाओगे
सच कहता हूं
मां कसम, मुँह की खाओगे
मुँह की खाओगे
**



प्रदूषण, मानव, दानव, बेटा, विज्ञान, माँ, अग्रज

Maa ka Akshar माँ का अक्षर




माँ,धुंधला,जहन, अक्षर, आँसू , पतँग 



माँ 


आज फिर से
दिखा है
धुंधला हुआ
जहन में
मां का अक्षर
जब उन्होंने
मुझे
बेटा कहा


बरस बीत गए
उनको गुजरे
पर
आज उनका ख्याल
फिर से उतरा है
धुंधला हुआ
जहन में
मां का अक्षर
फिर से उकरा है


जिंदगी के दर्पण में
जब मैं जवानी में हूं
तब जाकर आज फिर से
बचपन उभरा है
धुंधला हुआ
जहन में
मां का अक्षर
फिर से उकरा है


पहले हल्की सी मां की डांट पर
रो दिया करता था मैं
आज उनकी ममता देख
आंख से एक आंसू उकरा है
धुंधला हुआ
जहन में
मां का अक्षर
फिर से उकरा है

लगता है, उड़ेला है
किसी ने
अमृत घुला गंगाजल
एक सूखते पेड़ में
जिसकी साख पर
कई दिनों बाद
एक अंकुर उभरा है
धुंधला हुआ
जहन में
मां का अक्षर
फिर से उकरा है

कटी पतँग की ड़ोर मे
एक तनाव फिर से उतरा है
धुंधला हुआ
जहन में
मां का अक्षर
फिर से उकरा है
फिर से उकरा है
फिर से उकरा है
...............






माँ,धुंधला,जहन, अक्षर, आँसू , पतँग 

After Lock down लॉक डाउन के बाद



लॉक डाउन के बाद , आसमान, अमृत, बाँहे, लूट 




लॉक डाउन के बाद 


आसमान के नीचे खड़ा हूं मैं, अपनी बाहें फैलाए
हर पल की खुशी लूट रहा हूं मैं, सिमेट रहा हूं अपनी बाहें फैलाए

अमृत सुधा बिखेरती प्रभा आ रही है,
सुनो ध्यान से हर चीज गा रही है
गर्म बदन को स्पर्श करती चलती ये, ठण्डी हवाएं,
हर पल की खुशी सिमेट रहा हूं मैं, अपनी बांहें फैलाए

वसुंधरा को स्वर्ण करता रवि आ रहा है,
स्याही रात को पीता हुआ, प्रकाश छा रहा है
आज हर पल की खुशी लूट रहा हूं मैं,
और सिमेट रहा हूं अपनी बाहें फैलाए

आओ प्रकृति की खुशबू,आज पाएं
सिमेट ले इन्हे, अपनी बाहें फैलाए
अपनी बाहें फैलाए........
अपनी बाहें फैलाए........



लॉक डाउन के बाद , आसमान, अमृत, बाँहे, लूट 

बदला-बदला सा हाल badala-badala sa haal





बदला-बदला सा हाल, चेहरा, सुलझा,हाल,badala-badala sa haal, chehara, sulajha,haal


बदला-बदला सा हाल

बदला-बदला सा हाल रहता है मेरा,
क्यों बंद आंखों से देखता हूं चेहरा तेरा
क्यों तन्हाइयों में अक्सर हंसा करता हूं
और हल्की सी मुस्कान के साथ क्यों चुप हो जाता हूं

क्यों अब दोस्तों का साथ रास नहीं आता
क्यों अकेले बैठकर गाने को जी चाहता
आखिर क्यों बदला बदला सा हाल रहता है मेरा
क्यों बंद आंखों से देखता हूं चेहरा तेरा

पलकें बंद कर जागता हूं
जमीन पर खड़ा होकर भी आसमा छानता हूं
आखिर क्यों बदला बदला हाल रहता है मेरा
क्यों बंद आंखों से देखता हूं चेहरा तेरा

सुलझा हुआँ था में कभी
अब तुम्हारे ख्यालों मे उलझनें लगा हूँ
आखिर क्यों बदला बदला हाल रहता है मेरा
क्यों बंद आंखों से देखता हूं चेहरा तेरा




बदला-बदला सा हाल, चेहरा, सुलझा,हाल,badala-badala sa haal, chehara, sulajha,haal